पहलवान की ढोलक (7)

किंतु, सूर्यास्त होते ही जब लोग अपनी-अपनी झोंपड़ियों में घुस जाते तो चूँ भी नहीं करते। उनकी बोलने की शक्ति भी जाती रहती थी। पास में दम तोड़ते हुए पुत्र को अंतिम बार ‘बेटा!’ कहकर पुकारने की भी हिम्मत माताओं की नहीं होती थी । रात्रि की विभीषिका को सिर्फ़ पहलवान की ढोलक ही ललकारकर […]

पहलवान की ढोलक (7)

कहानी अच्छा है 🤔

कथा

Published by Dharmendra Ray

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